क्यों हिज़बुल्लाह और इज़रायल का युद्धविराम सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह गया है

क्यों हिज़बुल्लाह और इज़रायल का युद्धविराम सिर्फ कागजों पर सिमट कर रह गया है

लेबनान और इज़रायल के बीच अमेरिकी मध्यस्थता से तैयार हुआ पीस फ्रेमवर्क क्या वाकई जमीन पर टिक पाएगा? जून 2026 के आखिरी हफ्ते में वाशिंगटन में एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर तो हो गए, लेकिन हकीकत यह है कि यह डील शुरू होने से पहले ही दम तोड़ती दिख रही है। एक तरफ जहां इज़रायल ने दक्षिणी लेबनान में हिज़बुल्लाह के ठिकानों पर हमले तेज कर दिए हैं, वहीं दूसरी तरफ हिज़बुल्लाह ने दो-टूक शब्दों में कहा है कि इज़रायल के हमलों से लेबनान की रक्षा करना उसका अधिकार है।

यह केवल एक बयान नहीं है, बल्कि उस खोखले युद्धविराम की कड़वी सच्चाई है जो बंद कमरों में तो सफल दिखता है, लेकिन जमीनी स्तर पर बारूद की गंध में गायब हो जाता है।

क्या है हिज़बुल्लाह का नया रुख और इज़रायल के दावे

रविवार रात को जारी एक कड़े बयान में हिज़बुल्लाह ने स्पष्ट किया कि संगठन ने अब तक युद्धविराम का पालन किया है। लेकिन इज़रायल लगातार हवाई हमलों और जमीनी धमाकों के जरिए इस समझौते की धज्जियां उड़ा रहा है। हिज़बुल्लाह के मुताबिक, इज़रायल ने नबातीह, महफिदून और फारून जैसे रिहायशी और खुले इलाकों को निशाना बनाया है। हिज़बुल्लाह का कहना है कि वे इन तमाम उल्लंघनों पर नजर रख रहे हैं और अपने देश व नागरिकों की रक्षा के लिए जवाबी कार्रवाई करने का उनका हक कोई नहीं छीन सकता।

दूसरी तरफ, इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और रक्षा मंत्री इज़रायल काट्ज़ ने एक संयुक्त बयान जारी कर जमीनी कार्रवाई को सही ठहराया है। इज़रायली सेना (IDF) ने मज्दाल ज़ून गांव के पास हिज़बुल्लाह की एक बेहद हाई-टेक सुरंग को पूरी तरह नष्ट कर दिया। इज़रायल का दावा है कि 200 मीटर लंबी और 25 मीटर गहरी इस सुरंग में भारी मात्रा में आधुनिक हथियार छिपे थे, जिनका इस्तेमाल सीधे इज़रायली नागरिकों पर हमले के लिए होना था।


हकीकत यह है: इज़रायल का साफ कहना है कि जब तक हिज़बुल्लाह का पूरी तरह से निशस्त्रीकरण नहीं हो जाता, तब तक उसकी सेना लेबनान से पीछे नहीं हटेगी। वहीं हिज़बुल्लाह हथियार डालना तो दूर, इस समझौते को ही अपनी संप्रभुता का सौदा मान रहा है।

वाशिंगटन का वह ड्राफ्ट जो लेबनान को मंजूर नहीं

इस पूरे विवाद की जड़ उस फ्रेमवर्क समझौते में है जिसे अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बड़ी उम्मीदों के साथ पेश किया था। इस ड्राफ्ट के मुख्य बिंदु कुछ इस तरह थे:

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  • लेबनान की सीमा से इज़रायली सेना की चरणबद्ध वापसी होगी।
  • लेबनान सरकार देश के सभी गैर-सरकारी हथियारबंद गुटों (मुख्य रूप से हिज़बुल्लाह) का निशस्त्रीकरण करेगी।
  • दक्षिणी लेबनान और पूरे देश की सुरक्षा की कमान सिर्फ लेबनान की आधिकारिक सेना (LAF) के हाथ में होगी।
  • इस सुरक्षा बहाली के बदले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेबनान के पुनर्निर्माण के लिए भारी-भरकम आर्थिक पैकेज दिया जाएगा।

कागजों पर यह प्लान बेहद व्यावहारिक लगता है, लेकिन व्यावहारिक तौर पर यह लेबनान की राजनीतिक व्यवस्था को अंदर से हिला रहा है। लेबनान के संसद अध्यक्ष और हिज़बुल्लाह के करीबी सहयोगी नबीह बेरी ने इस समझौते को पूरी तरह खारिज कर दिया है। बेरी का कहना है कि यह बराबरी का समझौता नहीं है, बल्कि लेबनान पर थोपी गई शर्तें हैं। हिज़बुल्लाह के सांसद हसन फदलल्लाह ने तो यहां तक चेतावनी दे दी है कि सरकार का इस समझौते को स्वीकार करना देश को आंतरिक गृहयुद्ध और अराजकता की ओर धकेलने जैसा है।

क्यों नाकाम हो रहे हैं शांति के सारे प्रयास

अगर आप इस क्षेत्र के इतिहास और मौजूदा जमीनी समीकरणों को समझते हैं, तो आपको पता होगा कि लेबनान सरकार के पास इतनी सैन्य क्षमता ही नहीं है कि वह हिज़बुल्लाह को जबरन निहत्था कर सके। हिज़बुल्लाह लेबनान में सिर्फ एक मिलिशिया नहीं है, बल्कि वह एक मजबूत राजनीतिक दल है और उसका अपना एक विशाल सामाजिक व कल्याणकारी ढांचा है।

जब तक कोई भी अंतरराष्ट्रीय समझौता हिज़बुल्लाह के जमीनी प्रभाव और ईरान के रणनीतिक हितों को ध्यान में रखे बिना केवल "हथियार छोड़ने" की शर्त पर अड़ा रहेगा, तब तक सीमा पर बारूद बरसता रहेगा। इज़रायल अपनी सुरक्षा गारंटी के बिना पीछे नहीं हटेगा और हिज़बुल्लाह इज़रायली मौजूदगी को अपने वजूद के लिए खतरा मानकर हमले जारी रखेगा।

इस गतिरोध का सीधा नतीजा यह है कि सीमाई इलाकों से विस्थापित हुए लाखों आम नागरिकों की घर वापसी फिलहाल मुमकिन नहीं दिख रही है। शांति समझौते पर हस्ताक्षर होने के बावजूद लेबनान और इज़रायल की सीमा पर तनाव कम होने के बजाय और ज्यादा गहरा गया है।

AS

Audrey Scott

Audrey Scott is passionate about using journalism as a tool for positive change, focusing on stories that matter to communities and society.